कोरोना ने जहां पूरे विश्व को हिला कर रख दिया है, इससे कोई देश अछूता नहीं है इस महामारी में क्या आम और क्या खास सभी की कमर तोड़कर रख दी है, भारत देश में भी इस महामारी ने लोगों को अपनी चपेट में लिया है और कई सौ लोगों को मौत की नींद सुला चुका है ऐसे ही एक दर्द भरी दास्तान उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले से सामने आई है जहां कोरोना कॉल में बेबस पिता की दर्द भरी कहानी ऐसी है जिसे सुनकर आप भी नहीं रोक पाएंगे अपने आंशु बेबसी, मजबूरी, मुफलिसी और आंसुओं का सैलाब।
कुछ ऐसी ही दर्द भरी कहानी एक पिता की है...हंसते खेलते परिवार को न जाने किसकी नजर लगी, कि अब खुशियों का आंगन आसुओं के समंदर में डूब गया है....जिसने भी इस कहानी को सुना उसकी रूह कांप गई...न जाने कितने लोगों की आंखों से आंसू बह उठे...तो आप दिल थाम कर बैठिएगा, क्योंकि इस कहानी का दर्द आपको भी झंकझोंर देगा।
मेरठ के जागृति विहार का परिवार इस बात से अनजान था कि उनके परिवार में कोई बड़ी अनहोनी होने वाली है...इस परिवार के साथ इतना बुरा होगा, कभी इसका ख्याल ही नहीं आया, लेकिन दुख की दस्तक तेजी से आगे बढ़ रही थी...17 साल की बेटी के हाथ पीले करने की परिवार सोच रहा था, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था...अचानक से बेटी की तबियत खराब हुई...परिवार की माली हालत ठीक नहीं थी, डाॅक्टर्स ने राय दी कि बेटी को सरकारी अस्पताल ले जाओ...बेटी को मेरठ मेडिकल भर्ती करा दिया...जांच हुई तो पता चला कि पूरी दुनिया में महामारी की बड़ी वजह कोरोना वायरस ने उसे अपनी गिरफ्त में ले लिया है....पूरा परिवार सहम गया...अब परिवार को अहतियात के तौर पर क्वारेंटाइन कर दिया गया....एक-एक पल ऐसे गुज रहा था कि मानो एक साल के बराबर हो....बेटी अस्पताल में भर्ती, परिवार क्वारेंटाइन सेंटर में ....दिन बीते और फिर एक ऐसी खबर आई कि जिसको सुनते ही पूरा परिवार सदमें में आ गया...उनकी लाड़ली की 4 जून को मेडिकल में कोरोना से मृत्यु हो गई....अब युवती के शव को मोर्चरी रख दिया गया...परिवार इस कदर टूट गया कि आखिर क्या करें.... पूरा परिवार क्वारेंटाइन सेंटर में सारी रात सोया नहीं, अब इस कहानी में दूसरा दर्द भरा पहलू शुरू होता है...4 जून की रात, पांच जून और 6 जून की सुबह....युवती का शव अपनों के इंतजार में मोर्चरी में तड़पता रहा.....क्योंकि पूरा परिवार क्वारेंटाइन सेंटर में था तो फिर कैसे अंतिम संस्कार होता...बात निकली तो दूर तलक गई....अब आखिरकार क्वारेंटाइन सेंटर से युवती के पिता को मेडिकल लाया गया और फिर शव वाहन में बेटी के शव के साथ सूरजकुण्ड श्मशान घाट के लिए रवाना कर दिया गया. इस कहानी का तीसरा दर्दनाक पहलू देखिए...जिस बेटी को गोदी में खिलाया, जिसे उंगली पकड़कर चलना सिखाया, जो कभी प्यार से हक जताकर लड़ाई कर लेती थी, जो पापा-पापा कहकर गले लग जाती थी, वो पापा के सामने होते ही भी खामोश थी...क्योंकि लाश कभी बोला नहीं करती...पिता की आंख से आंसुओं का समंदर बह निकला था, जिसके कोई रोक नहीं सकता था...वो अपनी बेटी का शव भले ही छू नहीं रहा था, लेकिन उसकी सिसकियां शव वाहन के बाहर तक भी सुनाई दे रही थी....शव वाहन सूरजकुण्ड श्मशान में पहुंचकर रूक जाता है अब इस कहानी में चौथा दर्दनाक पहलू शुरू होता है....न तो पिता को पीपीई किट दी गई और न ही शव वाहन के चालक को...अब आखिर शव को शव वाहन से कौन उतारे.....अपनी लाडली को खो चुके बाप ने कई बार हिम्मत की, लेकिन उसकी हिम्मत हर बार जवाब दे गई...क्योंकि उसने जिस बेटी को गोदी में खिलाया और जिसके हाथ पीले करने की तैयारी कर रहा था आखिर वो पिता अपनी बेटी की लाश को कैसे उठा सकता था...यहां वेदना, संवेदना, दर्द, अहसास, प्यार, दुख, खामोशी, मजबूरी, बेबसी और न जाने किस-किस शब्द ने बेबस पिता को और बेबस कर दिया...अब आखिर इस शव को वाहन से कौन उतारता, क्योंकि चालक के पास भी पीपीई कट नहीं थी और शव उतारने के लिए कम से कम दो लोगों की जरूरत थी....बेबस पिता न गाड़ी से उतरा और न किसी से कुछ कहा....बस शव वाहन में बैठा अपने आंसुओं से अपनी लाड़ली को अंतिम विदाई दे रहा था..अ ब इस कहानी का पाचवा दर्दनाक पहलू देखिए...कि सूरजकुण्ड श्मशान घाट के पंडित आते हैं और अंतिम संस्कार के लिए लकड़ी लाने और अन्य सामान लाने के लिए पैसों की बात करते हैं...बस यही सुनते ही बेबस पिता हाथ जोड़कर रो पड़ता है कि साहब मजबूर हूं, एक भी पैसा नहीं है...क्वारेंटाइन सेंटर में था, कोई कमाई नहीं हो रही थी...कोई अपने साथ भी नहीं है...हर अपने ने मुंह मोड़ लिया है...मेरी मदद कर दीजिए, आपका अहसान नहीं भुलूंगा...कोरोना सेंटर से आते ही मेहनत मजदूरी करके आपकी पाई-पाई चुका दूंगा....अपनी बेटी की लाश के साथ बैठा पिता पहले ही टूट चुका था और फूट-फूटकर रो रहा था...वहां जो भी खड़ा था उनकी भी आंखों से आंसू छलक आए...अब कोई मदद को आगे नहीं आया...बड़े-बड़े दावे और वादे करने वाले शहर के लोग भी अपने कदम पीछे खींचे खड़े थे....शव वाहन चालक ने अपने मुखिया को फोन कर दिया कि साहब न तो कोई शव उतारने वाला है और न ही इनके पास अंतिम संस्कार के लिए पैसे हैं....फिर भी कोई मदद नही हुई...आखिर कौन पैसे दे बात इस पर आकर टिक गई...आखिरकार मेरठ सीएमओ डा. राजकुमार के पास जब ये बात पहुंची तो वो भी भावुक हो गए...उन्होंने बिना देर किए अंतिम संस्कार के लिए पैसे भिजवा दिए, .साथ ही नगर निगम के दो कर्मचारियों को बुलाकर उन्हें पीपीई किट दी गई और तब जाकर शव वाहन से शव उतरा और उसका अंतिम संस्कार हुआ....बेटी चिता में जल रही थी और सामने मजबूर और बेबस बाप का दिल जल रहा था। अब दूसरी एम्ब्यूलेंस आई और पिता को लेकर वापिस क्वारेंटाइन सेंटर चली गई....लेकिन इस बार पिता खामोश था, उसके आंसू सूख चुके थे, उसके कदम लड़खड़ा रहे थे...वो कुछ कहने की स्थिति में नहीं था...बस उसे देखकर उसके दर्द को समझा जा सकता था...क्वारेंटाइन सेंटर का दरवाजा खुला और लड़खड़ते कदमों से ये पिता उसके भीतर दाखिल हो गया...उसके दिल पर जो जख्म आए हैं उसके कोई नहीं भर पाएगा...काश! न ये कोरोना आता न इस पिता को यूं सताता... (बस कलम से आंसू टपका तो सोचा कि कुछ लिख दूं)